काश

काश बचपन में ही सिखाया होता,

अपना साथ कितना ज़रूरी होता है |


इतने बरस हम ज़ाया न करते,

जो नहीं है उनके याद में तड़पते हुए |


रिश्तों की चिता को,

प्यार की गर्मी समझते हुए |


खुद को संभल हम भी निकल पड़ते,  

अपने आप से ढेर से वादे करते,  

उनको निभाते हुए दिन गुज़ारते |


जाने कितने दिल टूटने से बच जाते |

कितने लम्हे किसी को खोने के डर से,

उसके होने के एहसास में बिताते |  


काश बचपन में ही सिखाया होता,

अपना साथ कितना ज़रूरी होता है,  

अपना साथ कितना ज़रूरी होता है...


Note: Shukriya Garima ji, Shrey ma'a for your thoughts.

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